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Kobita Hindi

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✍️ রচয়িতা: हरिवंशराय बच्चन 👁️ পাঠ সংখ্যা: 47 📅 প্রকাশিত: 12 Oct, 2026
(१) घर से यह सोच उठी थी उपहार उन्हें मैं दूँगी, करके प्रसन्न मन उनका उनकी शुभ आशिष लूँगी । (२) पर जब उनकी वह प्रतिभा नयनो से देखी जाकर, तब छिपा लिया अञ्चल में उपहार हार सकुचा कर । (३) मैले कपड़ों के भीतर तण्डुल जिसने पहचाने, वह हार छिपाया मेरा रहता कब तक अनजाने ? (४) मैं लज्जित मूक खड़ी थी, प्रभु ने मुस्करा बुलाया, फिर खड़े सामने मेरे होकर निज शीश झुकाया !

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